जिन्दगी जलेबी सी
उलझी है
मीठी है
दुनिया की चक्की में
मैदे सा पिसना है
प्यार की नमी से
मन का खमीर उठना है
गोल-गोल घुमा रही
सूरज की
मुट्ठी है
तेल खौलता दुख का
तैर कर निकलना है
वक़्त की कड़ाही में
लाल-लाल पकना है
चाशनी सुखों की
पलकें बिछाये
बैठी है
कुरकुरा बने रहना
ज़्यादा मत डूबना
उलझन है अर्थहीन
इससे मत ऊबना
मानव के हाथ लगी
ईश्वर की
चिट्ठी है
सुन्दर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंबहुत बहुत धन्यवाद
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