बड़ी अजीब हैं तुम्हारी यादें
दिमाग के थोड़े से आयतन में
छुपकर बैठी रहती हैं
तुम्हारी ठोस यादें
बस अकेलेपन की गर्मी मिलने की देर है
बढ़ने लगता है इनके अणुओं का आयाम
और ये द्रव बनकर बाहर निकलने लग जाती हैं
धीरे धीरे
जैसे जैसे
बढ़ती है अकेलेपन की गर्मी
ये गैस का रूप धारण कर लेती हैं
और भर जाती हैं दिमाग के पूरे आयतन में
अपना दबाव धीरे धीरे बढ़ाते हुए
एक दिन ऐसा भी आएगा
जब अकेलेपन की गर्मी इतनी बढ़ जाएगी
कि दिमाग की दीवारें
इन गैसों का दबाव सह नहीं पाएँगी
और ये गैसें
दिमाग की दीवारों को फाड़कर बाहर निकल जाएँगी
उस दिन तुम्हारी यादों को
मुक्ति मिल जाएगी
और मुझे शांति
मगर ये दुनिया कहेगी
कि मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया।
बस अकेलेपन की गर्मी मिलने की देर है
जवाब देंहटाएंबढ़ने लगता है इनके अणुओं का आयाम
और ये द्रव बनकर बाहर निकलने लग जाती हैं...kamaal ka likha hai
एक दिन ऐसा भी आएगा
जवाब देंहटाएंजब अकेलेपन की गर्मी इतनी बढ़ जाएगी
कि दिमाग की दीवारें
इन गैसों का दबाव सह नहीं पाएँगी
और ये गैसें
दिमाग की दीवारों को फाड़कर बाहर निकल जाएँगी
बहुत ही खूबसूरत.....
bhut hi acche se shabdo ko sjaya hao apne.. bhut khub!
जवाब देंहटाएंshandar rachana .....yu hi likhte rahiye ....shubhakamnaye
जवाब देंहटाएंबस अकेलेपन की गर्मी मिलने की देर है
जवाब देंहटाएंबढ़ने लगता है इनके अणुओं का आयाम
और ये द्रव बनकर बाहर निकलने लग जाती हैं
वैज्ञानिक भाषा में दिल की बात लिख दी है ... अच्छी प्रस्तुति
मगर ये दुनिया कहेगी
जवाब देंहटाएंकि मैं तुम्हारे प्यार में पागल हो गया । bahut khoob...